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जानिए शेर बड़ा कि पेड़





पृथ्वी के संतुलन को बनाये रखने के लिए वन्य जीवों तथा जंगलों का अपना महत्व है. शेर बड़ा कि पेड़, शेर जंगल का राजा तथा सबसे शक्तिशाली प्राणी होता है. उसके भय से कोई भी जंगल में आने की हिंम्मत नहीं कर सकता. वर्तमान युग में देश तथा अन्य देशों में इनकी (शेर) की संख्या के भारी कमी आई है. अंधाधुंध वनों का सफाया इसका एक प्रमुख कारण है.





आज व्यक्ति अपनी स्वार्थपूर्ति में तीन लिप्त हो गया है कि उसे अपने आसपास के वातावरण की परवाह ही नहीं है. वह निरंतर जंगलो की कटाई करवाता जा रहा है. लेकिन शायद वह उसके परिणामों से अवगत नहीं है. प्रकृति के खिलाफ आज तक जो भी खड़ा हुआ है, उसे बर्बादी ही मिली है. उसका और उससे जुड़े लोगों का जीवन तबाह हुआ है. इतिहास इसका साक्षी है.





शेर बड़ा कि पेड़





आज हम अपना जीवन लापरवाही से व्यतीत कर रहे है. हमने आबादी को बढ़ावा दिया, लेकिन यह नहीं सोचा कि हम रहेंगे कहाँ? फेक्ट्रीयों का निर्माण कराया, लेकिन यह नहीं सोचा कि उससे निकलने वाले हानिकारक रसायनों (Harmful Chemicals) को हम कहाँ फैकें या नष्ट करे. फलस्वरूप हमने जंगलों को काटना शुरू किया. हमने प्रकृति के खिलाफ बगावत शुरू की है और इसका परिणाम भी हमको जल्द है देखने को मिला है. शेर बड़ा कि पेड़ इस कथन से पर्यावरण प्रदूषण दिन दोगुना और रात चोगुना वृद्धि कर रहा है. कहीं भूमि प्रदूषण तो कहीं कुछ और चैन से साँस लेना भी दूभर हो गया है. आज जंगलों के ना होने से वर्षा का स्तर काफी कम हो चला है. तापमान निरंतर वृद्धि पर है. वाहनों से निकलने वाले तथा फेक्ट्रीयों कारखानों से निकलने वाले अत्यंत हानिकारक पदार्थ, रसायन आज मानव शरीर में प्रवेश कर भयानक तथा अंजान बीमारियाँ फेला रहे है. इसमें से कुछ Co2 (Carbon DiOxide ), So2 (Sulphur Di Oxide), No2 (Nitrogen Peroxide),  शीशा (शीशे के कण), CO (Carbon Monoxide) इत्यादि.





सड़कों के आसपास के वृक्षों की कटाई भी आज बेखोफ प्रगति कर रही है. इन कारणों से अम्लीय वर्षा हो रही है.





Heart, Cancer के मरीजों के बढ़ोत्तरी हुई है. Brain Cancer भी पीछे नहीं है. कुछ लोग चौरी हुए पेड़ों को काटने को ठेका लेकर बैठे हुए है. ये लोग इनसे प्राप्त लकड़ियों को विदेशों में फर्नीचर बनाने तथा अन्य दूसरे कामों के लिए बेच देते है और हम तथा हमारी सरकार चुपचाप तमाशा देखती रहती है. आजादी के बाद ५७ वर्षो में शायद ऐसे ही कुक कारणों से हम प्रगति नहीं कर पाए. हम अपने अंधविश्वासों को लिए आपस में लड़ते रहे. विलासिता का जीवन व्यतीत करते रहे और आज भी हमारी वही आदतें है. ना हम आवाज लगाना चाहते है और ना ही किसी और को लगाने देना चाहते है और जो लगाता है, उसे कुचल दिया जाता है. बस यही हमारी उन्नति है, हम आगे बढ़ना ही नहीं चाहते. विदेशियों ने हमारे साथ मजाक किया. हमें आपस में लडवाया, हमें अलग किया, हमारे मन में जहर घोला और इसी तरह ना जाने कितनी शताब्दियों तक हम गुलाम रहे. आज आजादी है तो सिर्फ नाम की. अब हमें होश में आना है. वनों की लकड़ियों की तस्करी पर रोक लगाना है. सडकों के दोनों और वृक्षों या पोधों की कतार लगाना होगी. हमें पुन: वनों का चक्रीकरण करना होगा यदि वन है तो जीवन है, हमारी सभ्यता है, संस्कृति है, वरना वो दिन दूर सभ्यता है, संस्कृति है, वरना वो दिन दूर नहीं जब अस्पतालों की संख्या भी हमारी लिए कम होगी.





हानिकारक तथा जानलेवा रसायनों को भूमि में डालने या किसी जलाशय में डालने से रोकना होगा, वरना कुछ समय पश्चात एक भी पेड़ नहीं होगा. बमों का परीक्षण तथा युद्ध में बमों का प्रयोग रोकना होगा, नहीं तो हमारी आने वाली पीढ़ी शारीरिक रचना तथा एनी दृष्टी से हमसे भिन्न होगी, जापान इसका सर्वोतम उदाहरण है.





आज वर्तमान युग में इस तरह के बम बना लिए गए है कि वे जिस जगह पर गिरेंगे. वहाँ पर कभी घास भी नजर नहीं आएगी. अत: हम सोच सकते है कि युद्ध में इसका प्रयोग हमारे, हमारे पड़ोसी देशों के लिए कितना खतरनाक साबित होगा. प्रकृति ने इस तथ्य में भी अपने संकेत दे दिए है.





हमारे देश में आज एक अरब से भी अधिक जनसंख्या है, यदि एक व्यक्ति भी कभी एक पौधे का प्रत्यारोपण करता है, तो वो दिन दूर नहीं, जब हमारा देश भी धन-धान्य, वैज्ञानिक खोजों में अमेरिका से भी अधिक ऊँचा होगा. यदि अच्छा भोजन हमें आहार में मिलता है, तो हमारी बुद्धि का विकास भी अच्छा होगा और वह हमें वृक्षों से ही मिल सकता है.





हमें ग्रीन प्लान को सशक्त बनाना होगा. यदि इसी तरह हम प्रयत्न करेंगे, तो आने वाले वर्षो में घटती वृक्षों की संख्या को हम जल्द ही पूर्ण कर सकेंगे.


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